23 की छुट्टी पर व्यंग्य




बाबू का मौजदिवस होगा।


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वाह रे बाबू होकर बेकाबू, जन्मदिवस बदलाया है,
जन्माष्टमी निश्चित 24 की,कान्हा 23 को जन्माया है।

नया पुरोहित पैदा हो गया,उपसचिव कहलाया है,
बाबू की जिद के आगे सारा,मूर्ख प्रदेश बनवाया है।

शनिवार को पहले छुट्टी, लेकिन वह सच में वाजिब थी,
है ईष्टदेव का जन्मदिवस, हर हिन्दू को सच में लाजिम थी।

शनिवार है 24 को,अब भी वही जन्मदिवस होगा,
नौकरशाही मौज करेगी,बस उनको मौजदिवस होगा।

जिस दिन का निश्चित है,उत्सव उस दिन ही होगा,
स्वार्थ का भूखा अफसर-बाबू,निश्चित लादिन ही होगा।

माना छुट्टी तुमको प्यारी थी,दो दिन पहले रो देते,
बच्चे-अभिभावक सूचित होते,छुट्टी सबको दे देते।

रात में जगते भूखे अफसर,क्योंकि छुट्टी के भूखे हैं,
इनके मन में भाव नहीं हैं,क्योंकि हर भाव इन्हीं के सूखे हैं।

संशोधन के पावर इनको, लेकिन पापी क्यों बन जाते हैं,
धर्मभावना और उत्सव दिन के,महापापी क्यों बन जाते हैं।

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