आलेख : व्याख्याता बनाम अध्यापक




आलेख - व्याख्याता बनाम अध्यापक
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थर्ड ग्रेड टीचर से लेक्चरर बने हुए करीब तीन महीने हो गए ।
बड़ी तमन्ना थी लेक्चरर बनने की पर जो अध्यापक मेरे जैसे छोटे स्कूल से बड़े स्कूल इस आशय से जाना चाहते है कि अब डाक-वाक का काम करना पड़ेगा तो उन भाई  बहनों को इस आलेख के माध्यम से  चेतावनी ।

ये जरूर है कि पीएस/यूपीएस में कागज ज्यादा पीटने पड़ते है तो यहाँ सीनियर में कंप्यूटर कीबोर्ड ज्यादा ठोकना पड़ता है | पर सूरते हाल वहीँ है कि डाके आते रहती है और जाती रहती है । अभी जयपुर कर्फ्यू के कारण नेट बन्द था और जब कुछ दिन बाद इंटरनेट चालू हुआ तो whatsapp पर इतने सरकारी आदेशों की बाढ़ एक साथ मेरे मोबाइल में घुसी कि फ़ोन हैंग हो गया । hm/ प्रिंसिपल वास्तव में नोबेल पुरस्कार के हकदार है कि इन डाको से निपटते है, और योद्धा की तरह विजयी बनकर उभरते है , खैर...


मिडिल और सीनियर स्कूल में काफी सारे अंतर है । जो मैंने मेरी नजर से मेरे चश्मे से देखे है ।
सबसे पहला अंतर है जो मुझे महसूस हुआ वो है डाक बनाने की कार्यवाही ।
मिडिल स्कूल में ऑफिस से लेकर क्लास रूम से लेकर activity area से लेकर प्रार्थना स्थल आदि सब कुछ करने की जगह बरामदा है ।
जब मिडिल स्कूल में डाक बनती है तो एक अध्यापक कागज कार्बन लाएगा, एक कागज पर लाइन खींचकर परफॉर्मा बनायेगा, तीसरा सूचना भरेगा और चौथा डिस्पैच करेगा । जो सूचना है वो भी मुस्कुराती है कि यहाँ  बड़ा सहयोग और सहअस्तित्व  है और वो डाक बड़ी खुश होकर फूली फूली रवाना होती है ।

सीनियर स्कूल में जिसको जो काम मिला, वो भोलाराम के जीव की तरह फाइल में घुसा कागज-पत्र पीटता रहता है और बाकी स्टाफ दबे पांव झट वहां से खिसक जाता है । पर इसके पीछे एक motto है कि "अपना हाथ जगन्नाथ" । सीनियर स्कूल में हर कोई अपना वजन खुद उठाकर चलता है । यात्री अपने सामान की स्वयं सुरक्षा करें ।


एक अंतर है ऑफिस फर्नीचर और स्टेशनरी का ।
मिडिल स्कूल में ऑफिस में 4 अलमारी होती है, किसी में तालाबंदी नही, और स्टाफ तो छोड़ो, बच्चों को भी पता रहता है कि कौनसा सामान कहाँ रखा है
"अरे 3A प्रप्रत्र फाइल लाना"
और वो बच्चा ये कहने पर अमुक फाइल उठा ले आता है ।

 सीनियर स्कूल में ऑफिस में बड़ी बड़ी अलमारी होती है । कद्दावर अलमारी, 6 फुटी, 7 फुटी, और सबकी सब locked और आज तीन महीने हो गए पर अभी तक नही पता कि किस अलमारी में क्या है । उनमे से खोलते खुलते भी एकाध अलमारी को देखा है । कभी कभी उन अलमारियों को घूरता रहता हूँ तो अचानक से डर भी लगने लगता है क्योंकि खली जैसी बड़ी लम्बी चौड़ी लगती है । ।

अच्छा मेरे पुराने मिडिल स्कूल में एक अलमारी के एक रैक में दुनिया भर की स्टेशनरी रहती थी । कैंची, स्टेपलर, पंचिंग मशीन, पैड, स्केच पेन, सुई धागा, आलपिन cello tap, कैलकुलेटर, पेंसिल, रबर, मार्कर, और उसी रैक के बगल में इन सब सामानों का अतिरिक्त स्टॉक रहता था । मतलब ऑफिस में 3 कैंची थी, 2 पंचिंग मशीन, 2 गोंद की शीशी तो 2, 3 फेविकॉल tube
सीनियर स्कूल में ऐसा खुलमखुला वाला रिवाज नही, थोड़ा बहुत तो घूंघट चलता है इसलिए  परीक्षा प्रभारी के अलमारी में लॉक होकर कैंची रहती है तो संस्थापन अलमारी में स्याही पैड, आज एक डाक बनाई तो सील की जगह हाथ से ही स्कूल का नाम लिखना पड़ा क्योंकि सीनियर स्कूल में सुरक्षा पर बड़ा ध्यान दिया जाता है ।
 मैंने तो ladies की तरह एक काले रंग का थैला ले लिया है उसी को लटकाए रखता हूँ और folding कैंची, ऊँगली जितना स्टेपलर, व्हाइटनर आदि सब सामानों के छोटे रूप गागर में सागर  बनाकर उसी थैले में  भर लिया है ।


मिडिल स्कूल में स्टाफ आपस में दोस्त बन जाते है । अक्सर शाम को एक दूसरे के यहाँ आना जाना , साथ साथ चाय और कभी कभी एक दूसरे के यहाँ खाना पीना भी हो जाता है । हर कोई एक दूसरे के परिवार से वाकिफ हो जाता है और हो भी क्यों नही, बरामदे में डाक बनाते बनाते चर्चा हो जाती है मित्रता हो जाती है और कभी कभी बड़े बड़े विवाद हो जाते है । टॉपिक राजनैतिक भी होते है और सामाजिक भी । लेकिन गर्मागर्म बहस के बाद अगले दिन अक्सर नॉर्मल हो जाता है । ये कह सकता हूँ कि थर्ड ग्रेड टीचर जानते है कि "खग जाने खग की भाषा" ।
स्टाफ का एक मेंबर दुसरे टीचर के बच्चों के नाम से लेकर ये तक जानता है कि दुसरे अध्यापक के पास कितनी जोड़ी शर्ट पेंट है ।  मिडिल स्कूल स्टाफ के बीच सामाजिकता का ये उदाहरण तो बहुत छोटा है कि किसी के यहाँ शादी ब्याह हो तो बाकी स्टाफ पक्का जायेगा बल्कि मेरा तो यहाँ तक अनुभव है कि मार्च में बोर्ड एग्जाम ड्यूटी में कहीं दूर कार्यरत थर्ड ग्रेड अध्यापिकाएं भी मिली है तो उनसे भी ढेर सारी बातचीत हुई और 8, 10 दिन की वीक्षक ड्यूटी के बाद 2 साल बाद भी आज तक उन teachers से whatsapp पर राम राम और होली दीवाली पर रामा - श्यामा होती है ।
सीनियर स्कूल में ऐसी अनोपचारिकता नही होती जी । यहाँ अनुशासन का मतलब है कि किसी से कोई बातचीत नही । सब एक दूसरे के साथ तभी मुहँ खोलते है जब निहायत ही जरुरी और सरकारी काम हो,
मेरे स्कूल में तो 4 अध्यापिकाएं है और एक महीने तक तो मुझे उनके नाम तक मालूम नही थे और आज 3 महीने बाद तक किसी से नमस्ते start नही हुई । सीनियर स्कूल में ऐसा माहौल रहता है कि जैसा फिल्म मुन्ना भाई mbbs में dr अस्थाना अपने पहले लेक्चर में एक लड़की student को देता है कि मेरे हाथ को देखों, बिलकुल स्थिर है, लेकिन मैं अपनी बेटी का ऑपरेशन करूँ तो ये कांपेगा, इसलिये दोस्ती/हमदर्दी का कोई स्थान नही । बड़ा स्कूल कबीर को follow करता है कि "ना काहू से दोस्ती, न काहू से बैर, कबीरा खड़ा बाजार में सबकी मांगे खैर"
मिडिल स्कूल इस गाने को मानता है - "आने वाला पल, जाने वाला है, हो सके तो इसमें जिंदगी बिता ले ...."
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✍लेखक - एक जीता जागता इंसान

(नोट-यह संस्मरण शिक्षक साथी ने व्हाट्सएप पर प्रेषित किया था,जिसका चयन अध्यापक से व्याख्याता पद पर हो गया ।मैंने तो कॉपी पेस्ट किया है।)

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